स्त्री और पुरूष दोनों के गुण
स्त्री और पुरूष दोनों के गुण
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स्त्री और पुरुष प्रकृति की सबसे सुंदरतम कृति है।
जगत का निर्माण विस्तार और इसी एक आकार देने में स्त्री पुरुष की सबसे बड़ी भूमिका है।
विपरीत लिंग होने के कारण दोनों के बीच आकर्षण स्वभाविक है, परंतु दोनों में समानताएं कम व असमानताएं अधिक होती हैं।
शादी स्त्री पुरुष के जीवन का ऐसा मोड़ होता है, जहां से उन्हे दंपत्ति के रुप में रहकर संतति कर्म को अपनाना पड़ता है।
जीवन में स्त्री पुरुष का समझदारी पूर्वक कदम उठाना ही विकास को बढ़ावा देता है।
स्त्री का सम्मान करने वाला पुरुष समाज में सम्मान पाता है।
दोनो ही अपने अच्छे कार्यों से समाज में स्थान बनाते हैं।
स्त्रियों में उत्साह रूपी गुण अक्सर दिखाई देते हैं और जबकि पुरुषों में गंभीरता के गुण।
ये ही अलग अलग गुणों के स्वरूप अलग पहचान रखते हैं।
समाज जा विकास मनुष्य ने ही किया, जिसमे स्त्री और पुरुष समान रूप से सहभागी होते हैं।
लेकिन समाज की नीव स्त्री मजबूत कराती है।
अपने बच्चों को अच्छे संस्कारों के द्वारा ।
कहते हैं कि यदि एक पुरुष को शिक्षित किया तो केवल वही शिक्षित होता है, जबकि यदि हम एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो वह दो परिवारों और आगे आने वाली पीढ़ी को भी वह शिक्षित करती है।
स्त्री को अगर देवी स्वरूप माना गया है तो पुरूष को भी परमेश्वर कहा जाता है।
दोनों ही अपने सद्गुणों अच्छे स्वभाव से पूजे जातें हैं। तभी ये संज्ञा मिलती है।
स्त्री और पुरूष एक रथ के दो पहियों के समान होते हैं। बराबर होते हुए भी, दोनो के कार्य भार अलग अलग होते हैं। सीधा पहिया बाई ओर नहीं लगता और उल्टा दाईं ओर।
स्त्री पुरुष के आपसी सम्बन्ध सम्पूर्ण मानवीय मूल्यों की ओर संकेत करता है।
दोनों का आपसी सामाज्य, प्रेम, एक दुसरे की भावनाओं की कद्र करना, स्त्री पुरुष को महान समझदार व्यक्तित्व का इन्सान बनाता है।
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गीता ठाकुर दिल्ली से
स्वैच्छिक रचना
प्रतियोगिता हेतु